अपनी अनोखी सुगंध
पल भर की ही सही, छिलके तो थे
उनके चरणों को पूजा
तो क्या हुवा विधी विधान नहीं भाया उन्हें
मधुदान भी दिए थे
बेवफायी मख्खी निकली तो दोष उनके
आजीवन पवन के संग चले
वचन बद्धता मन भर पूरे
पराग बिखरे तो है
हाँ उनके वृध्धि पूरा देख ना पाएंगे
लेकिन क्या रंग दीखते है
पराग रश्मी के संग खेलते उभरथे
हाँ हाँ मालूम है
बूँद भर की ये खेल अंत में
टिप्पणी सिर्फ इक बिन्दु मात्र
माला पहनाये चित्र में, जानके भी अनजाने
कुछ तो मार लिए तीर
और मारते रहने की आशा है