यार ने पूछा किया क्या अमल?
हम हँस के चल दिए, सोचते मन ही मन
अमा जनाब, इतनी आसां होती सफर
इक पड़ाव से दूसरी तक
पहुच नहीं जांते क्या मंजिल अब तक?
अभी पहुंचें हैं पड़ाव-ए-कुब्लीयत
थोडा मौज करने दो इस मंजर में
फिर सोचेंगे उस पडाव-ए-अम्ल पर
तै करना भी है ना सफर के फायदे
दूसरों के ही नहीं, हां खुद का भी.
अपनी फायदे की विशवास होने दो
फिर दौड़ पड़ेंगे उस सफर पर.
"వనజపై" నా టపాలో వ్యాఖ్యల్లో అడిగిన చిన్ని ప్రశ్నకు జవాబివ్వతానికి జాప్యం చేసింది ఎందుకా అని ఆలోచిస్తే తట్టిన సమాధానం ఇది :-(
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