Thursday, 25 February 2010

नौकरी भाग.

नौकरी भाग हैं तो हुए कायर
जाबाजी की कोई कदर नहीं
खुदखुशी में खुशी ढूंढें शायर
ये ज़माने की इन्साफ साकी


छोड़दी घर बार तमन्ना हम ने
छोकरी मार बन निकले साकी
प्यार दी चली तपांचा दिल पे
वार से बच निकलें, मुमकिन नहीं


दिखलाए भी क्या ज़ख़्म
मैदाने इश्क के साकी
औरत हात शिकस्त से
शर्मीली बन, छुपी सारी


शराब खाने के धब्बे जो बने
पहली हार के बनके निशानी
अल्ला कसम अब तक हम
मोहल्ले के थे शाणे साकी


बहुत देख्लिये मंज़र
इस सच झूट की लड़ाई
जंगे सच्चाई की शोर
अब हमें सहन नहीं साकी


बंद कर हर खिड़की
नूर को कर दो दूर
बाहों में जो हमें लें
बची इक माही नींद साकी


अपनी गले लग कर भी
गम तो बेवफा निकली
कूट कूट उस की यादें
दिल में समाई साकी


बस इक कटक इस में साकी
गम की मध् होश हम फिरे
अपनी नसीब की अज़ाब
अपनों को तबादला कर दी.

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