Sunday, 13 February 2011

Happy Valentines Dear.

हाँ कहलाना नही आयी
कहलाने की चाहत भी नही
जूनून ढूँढने निकलते ही  साकी
फैसला अपनी आप तै गयी

आँखों की चिलमन चीर
दिल जब बात कर सके
मीलों की दौड़ पर भी
दिल की धड़कन ना थके

खामोशी में भी जो दिल
पागलपन की चीक बन सके
मिलने की इतनी बेताबी हो
मिलन घबराके के छुप पड़े

निखाब कुशाई इस खोज की 
उन्ही के हात ऐसी बेशुमार हुयी
उन्हें ही इसकी जल्लादी लेनी पडी
सह न जो सके उस काली बेपर्दा नंगाई

माशूका भी वही
जल्लाद  भी वही
मोम वो थी या हम
सोचते ही रह गए

कलाई की ऐसी कमाल्गी
अपनी पहचान से बिछड़े हम
ऐसी परवाने बना के छोडी
दीवाने मौत में शहनाई सुने

शम्मा को कैसे दावत दें
दीवाने को सूझा ही नही
अन्दर की राज़दार जो था
जलाने की ही नही जलने की भी

जशन तो होनी थी
शाहनई जो बज चुकी
उनके बिना अधूरी
उनके सात बे-बर्दाश

for how could he invite
her to this macabre song
for him prospect o birth
for her hands o blood

फितरत से मजबूर
उन्हें छूना ही पडा
जलने की बू जो सून्गा
मीलो भाग गया कायर

दूरी अब ना सह सकेंगे
करीबी में जलना दिखेगी
चलो दोने जलेंगे कहके
नूर उनके कम न कर सकेंगे

Inevitable this toing n froing
n so is the slow death of both

one crying out
loud mouthed in burnt smell
in the eternal angst
of loss and selfishness

another tight lipped
in silent evaporation of self
selfless and selfish
ambiguity personified herself

do they pray for rebirth?
for a re-union?
GOK.
the only truth is
they scream till the end
each in own inimitable way.

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