Thursday, 27 January 2011

तू तो ऐसी ना बन.

 हर करतब कर चुके
हर कोशिश ना काम साकी
मुखोटा पार देखना
दुनिया जानी ही नही

जिस्म पहचान जो बनी
हम तडीपार हो गए साकी
दुनिया हमें ठुकराया
हमने उसे त्याग दी
किस कम्बखत को याद साकी

आदत से मजबूर थे
ढूंढते चल पड़े
आह्ट के पीट पीछे
कुत्ते बन हम साकी

इतनी सफर तै गयी
अब क्या शर्माना साकी
गली बदनाम ही सही
कली कुच्लाई तो भी
आह्ट जिसमे समाई
उसीके हम बेशक साकी

बेहोशी में भी भूले नहीं
पल भर के ही है ये अपनाई
ज़ालिम जिन्दगी कौनसी
जिन्दगी भर वफा वाली साकी

क्या पता इन वीरान हैरानी में ही
खामोश कुचली छिपी चीक इक मिले
मीरा की शुभ वाणी में जो हम कान्हा बने
उस बेज़ुबां की तलाश जारी साकी.

तू तो हमें बाते मत सूना
मैखाने नूर ए ज़ालिम
दलदली में बिसरी ही सही
अपनी खुशबू की कदर जान साकी.

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