ज़िंदगी भर की तलाश
उनकी यादों की पलाश
उखाड़े क्यों हातों से अपनी?
ये कैसी मांग उनकी साकी.
खुशहाली में बाँझ बन फिरते थे
प्यार की ऐसी तड़प थी
मिली इक पल की सांगत
फुलवती बन उठी मन मूरत
साकी, ये फिर बेदर्द ठान क्यूं?
ज़माना पत्थर बना तो क्या?
अम्मी बन जो ओ सहे
घायल भी हमें नसीब नहीं?
पंक की जनी है तो क्या
अपनी प्यार पंकज निराली
ज़माने भर पत्थर पड़े तो क्या
इक धब्बा भी छु न सकी साकी
फकरे मुस्कान की ताज पोशी
उनकी होठों पे करे हाल अपनी
चिलमन सजी आँखों से ही सही
बस, छोठी हसरत हो पूरी साकी
अनमोल रिश्ते की शान नहीं
अफ़सोस मोती जो सरके साकी
गुलाम हम अपनी मर्ज़ी से
उस्ताद से गुस्सा ?
नाजायीज़ी बतला उन्हें साकी.
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